Economics Of Growth And Development

हैरड का आर्थिक वृद्धि मॉडल || Harrod’s Economic Growth Model

हैरड का आर्थिक वृद्धि मॉडल (Harrod’s Economic Growth Model):

हैरड ने गुणक तथा त्वरक की अन्तःक्रिया के आधार पर अपने वृद्धि मॉडल का प्रतिपादन किया है। हैरड का आर्थिक मॉडल (हैरड का सिद्धांत) उन्हीं के शब्दों में ‘गुणक एवं त्वरक सिद्धान्तों के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध है।’

हैरड ने अपने सिद्धान्त में केन्सीय विश्लेषण को प्रावैगिक बनाने का प्रयास किया है। कीन्स ने अपने विश्लेषण में गुणक का प्रयोग तो किया है, परन्तु त्वरक की धारणा को कोई स्थान प्रदान नहीं किया है। हैरड का उद्देश्य सलत वृद्धि की दशाओं का अन्वेषण करना है तथा विकास के उन सम्भावित मार्गों का अध्ययन करना है जिन पर अर्थव्यवस्था सपाट रूप से आगे बढ़ सकती है।

हैरड मॉडल के प्रमुख आधार इस प्रकार है-

1. प्रावैगिक साम्य की उत्पत्ति ही विकास है—किसी देश के आर्थिक विकास के लिए तीन तत्व आवश्यक होते हैं- (अ) प्राकृतिक संसाधन, (ब) पर्याप्त मात्रा में कुशल श्रम शक्ति का उपलब्ध होना, (स) प्रति व्यक्ति उत्पादकता का उच्च स्तर जो उन्नत तकनीक और नवप्रवर्तन का फलन है।

2. पूंजी संचय विकास की कुंजी है—पूंजी आर्थिक संवृद्धि का प्रमुख निर्धारक घटक है। यह निवेश, रोजगार एवं आय के स्तर को महत्वपूर्ण हंग से प्रभावित करती है। हैरड के अनुसार बचते तीन प्रकार से की जाती हैं-

(अ) सामान्य बचते– भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु, (ब) उत्तराधिकार सम्बन्धी बचतें– संतान अथवा भावी पीढ़ी को धन हस्तान्तरण के उद्देश्य की पूर्ति हेतु, तथा (स) निगमों अथवा औद्योगिक संस्थाओं द्वारा की गई बचतेें मुख्यतया आर्थिक विकास में प्रयुक्त होती हैं।

हैरड के अनुसार एक स्थैतिक समाज में बचतें गतिशील नहीं हो पाती हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था में स्थिर ब्याज की दर पर बचत की मांग शून्य होती है निष्कर्ष रूप में, अल्पकाल में ब्याज की दर बढ़ने से बचतें कम होती है, परन्तु दीर्घकाल में ऊंची व्याज की दर पर ही अधिक बचते सम्भव हो पाती है।

एक प्रावैगिक समाज में उपर्युक्त तीनों प्रकार की बचत बढ़ती हैं। इस प्रावैगिक समाज में बचतों की कमी की समस्या न होकर बचतों के आधिक्य की समस्या उत्पन्न हो सकती है। यदि यह बचतें पूर्णतया उपयोग कर ली जाएं तो अर्थव्यवस्था सतत विकास के मार्ग पर अग्रसर हो जाती है।

हैरड द्वारा प्रयुक्त वृद्धि दरें तथा समीकरण-

हैरड के विकास मॉडल का उद्देश्य अर्थव्यवस्था के लिए एक स्थिर अथवा सतत वृद्धि की आवश्यक दशाओं का विश्लेषण करना तथा विकास के उन सम्भावित मार्गों की जानकारी प्राप्त करना है जिन पर अर्थव्यवस्था पर रूप से अग्रसर हो सकती है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु हैरड ने जो वृद्धि मॉडल प्रस्तुत किया है उसमें उन्होंने तीन प्रकार की वृद्धि दरों का उल्लेख किया है :

1. वास्तविक वृद्धि दर (Actual Growth Rate):

वास्तविक वृद्धि दर (G) वह दर है जिस पर कि देश वास्तव में विकास कर रहा है। यह दर बचत-अनुपात तथा पूंजी-उत्पाद अनुपात (COR) द्वारा निधारित होती है। वृद्धि की यह दर अल्पकालीन चक्रीय परिवर्तनों को प्रकट करती है।

हैरड ने इसे सूत्र रूप में इस प्रकार व्यक्त किया है:

GC=5

उपर्युक्त सूत्र में,

G = वास्तविक वृद्धि दर जो ∆Y/Y द्वारा व्यक्त की जा सकती है

C = पूंजी में शुद्ध बुद्धि जो आय में वृद्धि का विनियोग का अनुपात है, जो 1/∆Y द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।

s = बचत की औसत प्रवृत्ति अर्थात् S/Y है।

सूत्र में प्रतिस्थापित करने पर :

GC=s

या ∆Y/Y • 1/∆Y = S/Y या 1/Y=S/Y या I=S

यह सूत्र स्पष्ट करता है कि वास्तविक बचत (Expost Savings) और वास्तविक विनियोग (Expost Investment) आपस में बराबर होते हैं।

2. अभीष्ट अथवा आवश्यक वृद्धि दर (Warranted Growth Rate):

हैरड के शब्दों में, “आवश्यक वृद्धि दर (GH) विकास की वह दर होती है जिसे यदि प्राप्त कर लिया जाय तो उद्यमी ऐसी मानसिक स्थिति में होते हैं कि वे उसी प्रकार के विकास को करते रहने को प्रेरित होंगे।” स्पष्टतया यह दर किसी अर्थव्यवस्था की आय की ‘पूर्ण क्षमता वृद्धि दर’ होती है, क्योंकि यह पूंजी के बढ़ते हुए स्टॉक का पूर्ण उपयोग करती है। यह दर ‘उद्यमी सन्तुलन‘ की द्योतक है अर्थात् उद्यमी इस विकास दर से परम सन्तुष्ट रहते हैं। विकास की इस दर पर भी समाज में थोड़ी-बहुत ‘अनैच्छिक बेरोजगारी‘ विद्यमान रह सकती है।

समीकरण अथवा सूत्र रूप में अभीष्ट वृद्धि दर इस प्रकार है :

Gw. Cr=S

जहां, Gw = विकास की अभीष्ट दर तथा आय की पूर्ण क्षमता विकास दर जिसे ∆Y/Y द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।

Cr= पूंजी की आवश्यकता अर्थात पूंजी की वह मात्रा जो विकास की अभीष्ट दर बनाये रखने के लिए आवश्यक है। इसे आवश्यक पूंजी उत्पादन अनुपात भी कहते हैं जो 1/∆Y मूल्य के बराबर है।

S= बचत की सीमान्त प्रवृत्ति

उपर्युक्त सूत्र स्पष्ट करता है कि यदि अर्थव्यवस्था को विकास की अभीष्ट दर प्राप्त करना है तो आय में प्रति वर्ष Cr दर से वृद्धि होनी चाहिए।

अर्थात् Gw = S/Cr यानी सीमांत बचत-प्रवृत्ति)/(पूंजी-उत्पाद अनुपात)

हैरड का कहना है कि यदि आय में अभीष्ट दर से वृद्धि होती है तो अर्थव्यवस्था में पूंजी स्टॉक का पूर्ण प्रयोग होगा और उद्यमी, सृजित की हुई बचत का पूर्ण विनियोग करने को तत्पर रहेंगे। इस प्रकार Gw स्वतः धारणीय (Self sustaining) विकास की दर है तथा अर्थव्यवस्था यदि इसी दर से बढ़ती है तो यह सतत रूप से सन्तुलन पथ (Equilibrium Path) पर चलती रहेगी।

हैरड – वृद्धि मार्ग को निम्न चित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

हैरड का वृद्धि मॉडल Harrod Growth Model in Hindi
हैरड का वृद्धि मार्ग

चित्र में OS बचत फलन है। आय में Y से Y, तक परिवर्तन A (Y2 आय स्तर) पर S1 बचत के बराबर होने के लिए, निवेश को प्रोत्साहित करता है। बदले में यह निवेश आय को Y2 स्तर तक बढ़ा देता है। फलतः निवेश फलन Y1I1 से उठकर Y2I2 हो जाता है और नया बचत निवेश सन्तुलन S2 पर होगा। Y2 और I2 को Y1 और I2 के समान्तर दिखाया गया है, जो इस बात का प्रतीक है कि पूंजी उत्पादन अनुपात (Cr) स्थिर रहता है।

इसी प्रकार Y2 आय, निवेश I2, को और Y3 आय, निवेश I3, को प्रोत्साहित करती 13 है। इसी प्रकार अर्थव्यवस्था नये बचत निवेश संतुलन के सहारे विकास मार्ग पर अग्रसर होती रहती है। सारांश यह है कि “निवेश गुणक में कोई परिवर्तन न होने पर बचतों का अनुपात जितना अधिक होगा, संतुलन बनाए रखने के लिए पर्याप्त निवेश को बनाए रखने के लिए उत्पादन में वृद्धि की दर उतनी ही अधिक होगी।’

हैरड मॉडल के निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि पूर्ण रोजगार सन्तुलन विकास के लिए विकास की वास्तविक दर (G), विकास की अभीष्ट दर (Gw) के बराबर होनी चाहिए तथा पूंजी में शुद्ध वृद्धि (C), पूंजी की आवश्यक वृद्धि (C) के बराबर होनी चाहिए। यदि ऐसा होता है तो उद्यमियों को पूंजी आवश्यक मात्रा के बराबर बचते प्राप्त रहेगी जिससे प्रावैगिक साम्य की स्थिति उत्पन्न होगी अर्थात् सतत वृद्धि (Steady growth) सम्भव हो सकेगा।

यदि G और Gw बराबर नही है (G+Gw) तव अर्थव्यवस्था असन्तुलन में होगी। उदाहरण के लिए, यदि G>Gw होगा तब C<Cr होगा। जब Gw से G अधिक होता है तो अपर्याप्त वस्तुओं अथवा उपकरणों के कारण कमियां उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति दीर्घकालीन स्फीति उत्पन्न करती है, क्योंकि उत्पादकीय क्षमता में वृद्धि की अपेक्षा आय में वृद्धि अधिक होती है। इसके फलस्वरूप पूंजी वस्तुओं की भी कमी हो जाएगी, क्योंकि पूंजी वस्तुओं की वास्तविक मात्रा आवश्यक पूंजी वस्तुओं से कम है (C<C)।

इन परिस्थितियों में इच्छित निवेश बचत की अपेक्षा अधिक होगा और कुल उत्पादन कुल मांग से कम रह जाएगा। इस तरह, दीर्घकालीन स्फीति होगी। इसे चित्र 2(A) में प्रदर्शित किया गया है। चित्र में आय की वृद्धि दरें अनुलम्ब अक्ष पर तथा समय को क्षैतिज अक्ष पर दर्शाया गया है।

आय के प्रारम्भिक पूर्ण रोजगार स्तर Y0 से प्रारम्भ करते हुए, वास्तविक वृद्धि दर (G), बिन्दु E तक अभीष्ट वृद्धि पथ Gw के साथ t2 समय तक चलती है, परन्तु t2 समय के पश्चात् समय G तथा Gw में विचलन होता है तथा G>Gw रहता है। आगे की अवधियों में दोनों के बीच विचलन बढ़ता ही जाता है।हैरड का अर्थिक वृद्धि मॉडल Harrod's Economic Growth Model

 

इसके विपरीत, वृद्धि की वास्तविक दर वृद्धि की अभीष्ट दर से कम है (G<Gw) तो Cr की तुलना में पूंजी में शुद्ध वृद्धि अधिक होगी (C<Cr)। इसका तात्पर्य यह कि इच्छित निवेश बचत से कम है और कुल मांग पूर्ति से कम रह जाती है। ऐसी स्थिति के कारण अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक मन्दी व्याप्त हो जाएगी।

इसे चित्र 2(B) में प्रदर्शित किया गया है। जब समय t2 के पश्चात् Gw से G नीचे गिरना प्रारम्भ करता है तथा दोनों एक दूसरे से दूर होते जाते हैं।

हैरड का कथन है कि जब एक बार Gw से G अलग हो जाता है तो यह सन्तुलन से दूर होता चला जाएगा। उनके अनुसार, “उन्नत रेखा पर बने रहने से ही, वह अकेली सन्तुष्टि दे सकती है, परन्तु उसके गिर्द अपकेन्द्री (centrifugal ) शक्तियां क्रियाशील रहती हैं, जो व्यवस्था को आवश्यक उन्नति रेखा से दूर-दूर जाती है।”

अत: G तथा Gw में सन्तुलन छुरी-धार सन्तुलन (Knife-edge equilibrium) है। जब यह एक बार भंग हो जाता है तो स्वयं सन्तुलन में नहीं आ पाता। इस स्थिति में सार्वजनिक नीति का एक बड़ा कार्य यह होता है कि अर्थव्यवस्था में दीर्घकालीन स्थिरता बनाए रखने के लिए G तथा Gw को इकट्ठे रखा जाए।

अन्य शब्दों में, दीर्घकालीन स्थिरता के लिए वृद्धि की वास्तविक दर तथा वृद्धि की अभीष्ट दर में समानता रहनी चाहिए। इसे दृष्टिगत रखते हुए हैरड ने प्राकृतिक वृद्धि दर की व्याख्या की है।

प्रो. हैरड ने विकास की प्राकृतिक दर में वृहत परिवर्तनीय चरों; जैसे जनसंख्या, तकनीकी प्रगति प्राकृतिक संसाधनों को शामिल किया है। उन्हीं के शब्दों में, “यह विकास की वह दर है जो जनसंख्या सें वृद्धि एवं तकनीकी सुधारों के बावजूद होती है । इसका निम्न सूत्र है: Gn.Cr=S या Gn.Cr≠S

उपर्युक्त सूत्र में Gn = विकास की प्राकृतिक दर। इसके द्वारा विकास की उच्च सीमा निर्धारित होती है। अर्थव्यवस्था Gn की सीमा से ऊपर नहीं जा सकती, क्योंकि उसके बाद प्राकृतिक संसाधन और श्रमपूर्ति की सीमाएं लागू होने लगती हैं। Cr का आशय पूंजी की आवश्यकता से है तथा S का अर्थ बचत की औसत प्रवृत्ति से। उक्त सूत्र से यह भी स्पष्ट है कि Gn Cr बचत की औसत प्रवृत्ति के बराबर हो भी सकता। और नहीं भी।

G, Gw तथा Gn में भिन्नता ( Divergence among G, Gw and Gn):

रोजगार का पूर्ण सन्तुलन बनाये रखने के लिए वृद्धि की प्राकृतिक दर, विकास की अभीष्ट दर तथा उत्पादन में विकास की दर में समानता आवश्यक है। अर्थात् पूर्ण रोजगार सन्तुलन के लिए, G= Gw = Gn

इस तरह, हैरड के अनुसार जब विकास की तीनों दरें समान होती हैं तो अर्थव्यवस्था स्थिर संवृद्धि दर पर विकास करती है। श्रीमती जॉन रॉबिन्सन के अनुसार, यह विकास की स्वर्णिम अवस्था’ (Golden Stage of Development) कही जाएगी।

किन्तु हैरड के विचार में यह एक छुरी-धार सन्तुलन (Knife-edge equilibrium) है जिसे सरलता से प्राप्त नहीं किया जा सकता। विकास दरों के बीच विचलन की चार स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं :

(i) यदि G अधिक है Gw (G>Gw) से

ऐसी दशा में निवेश बचत की तुलना में तेजी से बढ़ता है और आय की वृद्धि दर Gw से अधिक होती है। ऐसी दशा में वास्तविक पूंजी (C) आवश्यक पूंजी (Cr) से कम होगी जो अर्थव्यवस्था में दीर्घकालीन स्फीति उत्पन्न करेगी। अर्थात् यदि G>Gw, तब C <Cr (दीर्घकालीन स्फीति दशा)

(ii) यदि G कम है Gw (G<Gw) से

ऐसी दशा में निवेश बचत की तुलना में घटता है और दीर्घकालीन मंदी दशा उत्पन्न होती है।

अर्थात यदि G>Gw, तब  C> Cr (दीर्घकालिक मंदी दशा)

(iii) यदि Gw अधिक है Gn (Gw>Gn) से

ऐसी दशा में अर्थव्यवस्था में दीर्घकालीन गतिहीनता (Secular Stagnation) उत्पन्न होती है। इस दशा में Gw, G से भी अधिक हो जाती है, क्योंकि G की ऊपरी सीमा Gn द्वारा ही निर्धारित होती है।

(iv) यदि Gw कम है Gn (Gw <Gn) से

इस दशा में दीर्घकालीन स्फीति उत्पन्न होती है। पूंजीगत वस्तुओं की कमी तथा श्रम की प्रचुरता हो जाती है। लाभ की दर ऊंची होती है। क्योंकि इच्छित निवेश वास्तविक निवेश से अधिक होता है। व्यवसायियों का रुझान अपने पूंजी स्टॉक में वृद्धि करना होता है। परिणामस्वरूप स्फीतिक परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं।

तेजी एवं मंदी की सीमाएं- हैरड का कथन है कि तेजी तथा मंदी के आने की भी सीमाएं होती हैं। उनके अनुसार (i) G, Gn से बहुत अधिक ऊपर नहीं जा सकता। (ii) जब G, Gn के बराबर होने लगती है तब Gw भी बढ़ जाती है। (iii) इसी तरह अर्थव्यवस्था एक न्यूनतम सीमा से नीचे नहीं जा सकती। इसका कारण यह है कि विकास शून्य की सीमा तक कभी नहीं पहुंचता, क्योंकि पूंजी निर्माण कभी भी शून्य नहीं हो सकता है।

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हैरड मॉडल में यह अस्थिरता इसकी आधारभूत मान्यताओं की दृढ़ता के कारण हैं। ये मान्यताएं है- स्थिर उत्पादन फलन, एक स्थिर बचत अनुपात तथा श्रम शक्ति की एक स्थिर वृद्धि दर। अर्थशास्त्रियों ने इस दृढ़ता को उत्पादन फलन में पूंजी और श्रम को स्थानापन्नता प्रदान करके, बचत अनुपात को लाभ दर का फलन बनाकर मुक्त करने का प्रयास किया है।

हैरड मॉडल का नीति निहितार्थ है कि बचत स्फीति अन्तराल अर्थव्यवस्था में एक अच्छाई है जबकि यह अवस्फीति अन्तराल में दोष। अतः एक उन्नत अर्थव्यवस्था में स्थिति की मांग के अनसार बचत को घटाना अथवा बढ़ाना पड़ता है।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रभाव- प्रारम्भ में हैरड का विश्लेषण ‘बन्द अर्थव्यवस्था’ (Closed economy) की अवधारणा पर आधारित था, परन्तु बाद में उन्होंने विदेशी व्यापार न होने की धारणा को हटा दिया जिसके फलस्वरूप उनके समीकरण ने इस तरह का रूप धारण किया: (i) G.C. =S-b (ii) Gw.Cr=S-b (iii) Gn.Cr=S-b जहां, b = भुगतान सन्तुलन।

हैरड का तर्क है कि ऐसे देशों में जहां Gw > Gn से मंदी फैलती है वहां यदि b का मान धनात्मक है अर्थात भुगतान सन्तुलन अनुकूल हो तो इससे मंदी दूर करने में सहायता मिलती है। क्योंकि इससे Gw घटती है अथवा Gn बढ़ती है जिससे आर्थिक विकास गतिशील होने लगता है। इसके विपरीत मुद्रास्फीति वाले देशों में ‘b’ का मान ऋणात्मक होने से अतिरिक्त क्रय शक्ति विदेशों में जाने लगती है।

हैरड के अनुसार निर्यात के बढ़ने से विकास को बल प्राप्त होता है। उनका विश्वास था कि विदेशी व्यापार पूंजी की अन्तर्राष्ट्रीय गतिशीलता में वृद्धि करता जिससे विकास की प्राकृतिक दर (Gn) बढ़ जाती है और साथ ही उन्नत देशों से तकनीकी ज्ञान का निर्यात होने लगता है।

हैरड मॉडल की संक्षिप्त अवधारणा:

हैरड के मॉडल को सरल एवं संक्षिप्त रूप में निम्नवत व्यक्त किया जा सकता है :

(1) असाम्य प्रक्रिया के माध्यम से अर्थव्यवस्था का किसी एक साम्य से दूसरे उच्च साम्य की तरफ गतिशील होना ही आर्थिक विकास है। अन्य शब्दों में, प्रावैगिक साम्य को उत्पन्न करना ही आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है।

(2) आर्थिक संवृद्धि के लिए आवश्यक है कि या तो बचतों की मात्रा को बढ़ाया जाय अथवा पूंजी-उत्पाद अनुपात को घटाया जाय। हैरड मॉडल के अनुसार,

वृद्धि की दर= बचत दर/ पूंजी-उत्पाद अनुपात

अर्थात् Gw= S/Cr या Gw.Cr = S

(3) हैरड मॉडल में पूंजी विकास का इंजन है और इच्छित बचतें एवं पूंजी-उत्पाद अनुपात विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

(4) हैरड के वृद्धि मॉडल का प्रमुख उद्देश्य बचतों एवं उत्पादन-क्षमता का सर्वोत्तम ढंग से करते हुए पूर्ण रोजगार की स्थिति को प्राप्त करना है। उनके मॉडल के मुख्य यंत्र हैं—बचत, पूंजी निवेश, उत्पादकता तथा आय।

(5) व्यापार चक्र विकास का एक प्रेरक तत्व है, क्योंकि इससे उत्पन्न प्रत्येक नया साम्य अर्थव्यवस्था को विकास की ओर ढकेलता है। हैरड ने तेजी तथा मंदी को सतत वृद्धि की रेखा के विचरण के रूप में स्वीकार किया है।

(6) संक्षेप में, हैरड के अनुसार बचतों की वृद्धि -> विनियोग में वृद्धि -> उत्पादकता में वृद्धि -> आय में वृद्धि -> पुनः बचत व विनियोग में वृद्धि होती है और यह क्रम इसी तरह संचयी रूप में चलता रहता है।

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नीतिश कुमार मिश्र
नीतिश कुमार मिश्र (Neetish Kumar Mishra) इस वेबसाइट के फाउंडर हैं। वे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से स्नातक एवं महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से परास्नातक (अर्थशास्त्र) कर चुके हैं। अब वे इस वेबसाइट के माध्यम छात्रों को बेहतर कंटेंट देकर उनको आगे बढ़ाने की ओर प्रयासरत हैं।