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फर्म के प्रबन्धकीय सिद्धांत || Managerial theories of the firm

फर्म के व्यवहारवादी सिद्धान्त के अतिरिक्त, हाल के वर्षों में विकसित किए गए अन्य महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त विलियम्सन, मारिस तथा बॉमल के प्रबन्धकीय सिद्धान्त हैं। व्यवहारवादी सिद्धान्तों के समान प्रबन्धकीय सिद्धान्त में व्यावसायिक फर्मों की कार्य-प्रणाली से सम्बन्धित लाभ अधिकतम करने की परिकल्पना की वैधता को स्वीकार नहीं करते हैं।

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ये सभी प्रबन्धकीय सिद्धांत निगमित फर्मों की कीमत, उत्पादन तथा बिक्री इत्यादि से सम्बन्धित निर्णय करते समय प्रबन्ध उसके स्वहित प्राप्त करने की भूमिका पर जोर देते हैं। चूंकि निगमित फर्मों के प्रबन्धक अधिकतम करने की बजाय अन्य बातों से प्रेरित होते हैं, अतः कीमत उत्पादन से सम्बन्धित निर्णयों के लाभ को अधिकतम करने वाली फर्म के निर्णयों से भिन्न होने की सम्भावना होती है।

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बॉमल का बिक्री अधिकतम करने का सिद्धान्त भी एक प्रकार से फर्म का प्रबन्धकीय सिद्धांत है। उन्होंने इस आधार पर फर्म द्वारा बिक्री को अधिकतम करने को अपनाने के पक्ष में तर्क कि उनका यह अनुभव है कि प्रबन्धक हमेशा लाभ के बजाय बिक्री को अधिकतम करने का प्रयास करते हैं तथा एक प्रबन्धक की प्रतिष्ठा एवं ख्याति उसके द्वारा प्रबन्धित फर्म की बिक्री निष्पादन पर निर्भर करती है।

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स्पष्ट है तथा एक प्रबन्धक पूर्ण रूप से लाभ की उपेक्षा नहीं कर सकता क्योंकि यदि फर्म अस्तित्व में रहना चाहती है तो उसे रूप से अंशधारियों को स्वीकार्य लाभांश अवश्य करना चाहिए तथा उन लोगों को अच्छे लाभांशों का वायदा वर्तमान चाहिए जो फर्म द्वारा निगमित नए शेयर खरीदते हैं। अतः बॉमल के अनुसार फलों के प्रबन्धक न्यूनतम लाभ स्तर करने के साथ को अधिकतम करने का लक्ष्य रखते हैं।

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