स्थिर लागत और परिवर्ती लागत क्या है? What is Fixed Cost and Variable Cost in Hindi?
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कुल लागत के घटक: स्थिर लागत और परिवर्ती लागत क्या हैं?

कुल लागत के घटक: स्थिर लागत और परिवर्ती लागत क्या हैं? (What is Fixed Cost and Variable Cost in Hindi)

एक वस्तु की किसी मात्रा में उत्पादन करने में जो कुछ भी एक उत्पादक को खर्च करना पड़ता है वही उस मात्रा की कुल लागत होगी। परन्तु उत्पादन के लिए आवश्यक विभिन्न साधनों की प्रकृतियों का ध्यान से अध्ययन करने पर हमें पता चलता है कि विश्लेषण की दृष्टि से उन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है- स्थिर लागत तथा परिवर्ती लागत। स्थिर लागत और परिवर्ती लागत क्या हैं? (What is Fixed Cost and Variable Cost in Hindi?)

कुछ साधन तो ऐसे हैं कि आवश्यकतानुसार उत्पादक जब चाहे उनकी मात्राओं को घटा या बढ़ा सकता है। दूसरी ओर, कुछ ऐसे साधन भी होते हैं जिनकी मात्राएं एक समयावधि तक स्थिर रहती हैं तथा आवश्यकतानुसार घटाई या बढ़ाई नहीं जा सकतीं। इसके परिणामस्वरूप उस समयावधि के दौरान वैकल्पिक उत्पादन सम्भावनाओं में से चयन करने की फर्म की स्वतन्त्रता सीमित हो जाती है।

स्थिर लागत और परिवर्ती लागत (Fixed Cost and Variable Cost in Hindi)

अब आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि स्थिर लागत और परिवर्ती लागत क्या है? (Fixed Cost & Variable Cost in Hindi) नीचे हम आपको इसी के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं।

स्थिर लागत क्या है? (What is Fixed Cost in Hindi?)

जिन साधनों की मात्राओं में कुछ समयावधि तक परिवर्तन नहीं किया जा सकता, उनकी लागतों को स्थिर लागत (Fixed Cost in Hindi) कहते हैं। अल्पकाल में दी हुई साज-सज्जा के कम या अधिक सघन प्रयोग से ही उत्पादन में परिवर्तन किए जा सकते हैं।

प्रथम, किसी वस्तु का उत्पादन आरम्भ करने के लिए कुछ मशीनों, इमारतों, उपकरणों तथा अन्य यंत्रों जैसे चिरस्थाई पूंजीगत वस्तुओं की एक न्यूनतम मात्रा की आवश्यकता पड़ती है, जिनकी यदि ठीक प्रकार से देख रेख की जाए तो वे लम्बे समय तक उत्पादन में योगदान कर सकती हैं। ऐसी चिरस्थाई पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन में योगदान केवल एक बार के प्रयोग से ही समाप्त नहीं हो जाता बल्कि भविष्य में एक लम्बे समय तक चलता रहता है।

ऐसी पूंजीगत वस्तुओं से प्राप्त होने वाली प्रतिफल उनके पूरे उत्पादन जीवन काल पर फैले हुए होते हैं। इसलिए ऐसी पूंजीगत वस्तुओं में अपनी पूंजी फँसाने से पहले उत्पादक को उनसे प्राप्त होने वाले प्रतिफलों के पूरे प्रवाह के बारे में पूर्वानुमान लगाना पड़ता है। उत्पादक ऐसी चिरस्थाई पूंजीगत वस्तुओं में अपनी पूंजी तभी फंसाएगा जबकि उसे इन बात की पूरी आशा हो कि वह उनके पूरे उपयोगी जीवन काल से कम से कम एक साधारण प्रतिफल (जो कि कम से कम वर्तमान व्याज दर के बराबर तो हो) प्राप्त कर सकेगा।

केवल अल्पकालीन संभाव्य प्रतिफलों के कारण ही वह ऐसी चिरस्थाई पूंजीगत वस्तुओं की स्थापना में अपनी पूंजी नहीं फंसाएगा। ऐसी वस्तुओं के निर्माण में भी आम तौर पर काफी समय लगता है। इस सीमाओं के कारण अल्पकाल में ऐसी वस्तुओं की मात्रा में परिवर्तन करना संभव नहीं होता।

अन्य शब्दों में, हम कह सकते हैं कि अल्पकाल में ऐसी वस्तुओं की मात्रा स्थिर होती है।
इन परिस्थितियों में वस्तु की मांग में अल्पकालीन उतार चढ़ावों से निपटाने के लिए दी हुई साज-सज्जा के साथ अन्य साधनों की कम या अधिक मात्रा का प्रयोग करके कम या अधिक उत्पादन करने के अलावा फर्म को और कोई विकल्प उपलब्ध नहीं होता।

फर्मों के प्रबन्धक, मैनेजर, सुपरवाईजर, तथा अन्य स्थाई कर्मचारी, जो किफमों के तथाकथित “प्रबन्ध में शामिल होते हैं, की प्रकृति भी अन्य स्थिर साधनों जैसी ही होती है।फर्म की स्थिर साज-सज्जा तथा उसके प्रबन्ध का संयोग, जिसे फर्म का प्लांट भी कहा जाता है, उत्पादन की एक विशेष मात्रा के उत्पादन के लिए उपयुक्त होता है, अर्थात् उसकी सहायता से वस्तु की एक विशेष मात्रा को न्यूनतम लागत पर उत्पन्न किया जा सकता है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि दी हुई साज-सज्जा की सहायता से अधिक या कम उत्पादन नहीं किया जा सकता।

दी हुई सज्जा के कम या अधिक प्रयोग से (अर्थात् अन्य परिवर्ती साधनों की कम या अधिक मात्रा का प्रयोग करके) कम या अधिक उत्पादन करना संभव तो होता है। परन्तु ऐसी दशा में उत्पादन की औसत लागत न्यूनतम से अधिक होती है। ऐसे साधन, जिनकी मात्राओं में कुछ समय तक कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता, की लागतों के योग को स्थिर लागत (Fixed Cost in Hindi) कहा जाता है।

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परिवर्ती लागत क्या है? (What is Variable Cost in Hindi?)

ऐसे उत्पादन साधनों की लागतों को परिवर्ती लागत (Variable Cost in Hindi) कहते हैं जिनकी मात्राओं में अल्पकाल में भी परिवर्तन किया जा सकता है। कुछ ऐसे साधन भी हो सकते हैं जिनकी मात्राओं में अल्पकाल में भी आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सकता है। ऐसे साधनों की लागतों को अर्थशास्त्र की भाषा में परिवर्ती लागत (Variable Cost in Hindi) कहते हैं।

मजदूरों, कच्चे माल, ऊर्जा, ईंधन, चिकनाई, परिवहन इत्यादि की लागतों के कुछ उदाहरण हैं। उदाहरणतः मान लीजिए, यदि एक कपड़ा फैक्ट्री अधिक कपड़ा उत्पादन करना चाहती है तो उसे रुई, श्रम, रंग, ऊर्जा, ईंधन चिकनाई इत्यादि की अधिक आवश्यकता पड़ेगी।
दूसरी ओर, यदि फैक्ट्री कम कपड़ा उत्पादित करना चाहती है तो उसे इस प्रकार की वस्तुओं की कम आवश्यकता पड़ेगी और यदि उत्पादन बिल्कुल न किया जाए तो ऐसी वस्तुओं की कोई आवश्यकता न होगी।

इस प्रकार हम देखते हैं कि (1) परिवर्ती साधनों की आवश्यकता केवल तब पड़ती है जब फर्म को कुछ उत्पादन करना होता है, नहीं तो नहीं और (2) इन साधनों की मात्रा उत्पादन स्तर में परिवर्तनों के साथ घटती बढ़ती है। अतः जब एक फर्म कोई उत्पादन नहीं करती तो परिवर्ती लागत शून्य होगी और यदि उत्पादन करती है तो उत्पादन स्तर के अनुसार परिवर्ती लागत कम या अधिक होगी।

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नीतिश कुमार मिश्र
नीतिश कुमार मिश्र (Neetish Kumar Mishra) इस वेबसाइट के फाउंडर हैं। वे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से स्नातक एवं महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से परास्नातक (अर्थशास्त्र) कर चुके हैं। अब वे इस वेबसाइट के माध्यम छात्रों को बेहतर कंटेंट देकर उनको आगे बढ़ाने की ओर प्रयासरत हैं।

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